श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पहुंचीं लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल, व्यासपीठ से लिया आशीर्वाद
परमहंस वह है, जो संसार में रहकर भी संसार के दोषों से निर्लिप्त रहे : स्वामी सुधीरानंद जी महाराज
लखनऊ। अखिल भारतीय उत्तराखंड महासभा (धार्मिक प्रकोष्ठ) के तत्वावधान में वृंदावन सेक्टर-11 स्थित ज्ञान सरोवर विद्यालय में आयोजित सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस श्रद्धा और भक्ति का वातावरण देखने को मिला। कथा स्थल पर लखनऊ की महापौर श्रीमती सुषमा खर्कवाल पहुंचीं। उन्होंने कथा व्यास परम पूज्य स्वामी श्री सुधीरानंद जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त किया और व्यासपीठ के समक्ष बैठकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया।
इस अवसर पर महापौर सुषमा खर्कवाल ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि संत-महात्माओं के चरण जहां पड़ते हैं, वह स्थान पवित्र हो जाता है। संतों का आशीर्वाद जीवन के कठिन से कठिन संकट को पार करने की शक्ति प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पूर्व लखनऊ के कई क्षेत्रों में बिना बारिश के जलभराव की स्थिति उत्पन्न होने से हजारों लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा था। हालांकि, संतों की कृपा और प्रशासन के प्रयासों से स्थिति पर नियंत्रण पाया गया और बीमारी फैलने की आशंका भी टल गई।
महापौर ने कहा कि काशी और अयोध्या के कायाकल्प के बाद अब मथुरा-वृंदावन के विकास की बारी है। इन पवित्र धार्मिक स्थलों को भी सुंदर, सुव्यवस्थित और विकसित बनाने की दिशा में प्रयास किए जाएंगे।
परमहंस का स्वरूप और श्रीमद्भागवत की महिमा का वर्णन
कथा के तृतीय दिवस परम पूज्य स्वामी श्री सुधीरानंद जी महाराज ने परमहंस के स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण स्वयं परमहंसों की संहिता है। इसके प्रथम श्लोक में वर्णित ‘निगमकल्पतरोर्गलितं फलं’ भागवत की महिमा को प्रकट करता है। यह ऐसा दिव्य फल है, जिसका रस परमहंस संतों ने ग्रहण किया है।
महाराज जी ने कहा कि परमहंस वह होता है, जो हंस की भांति नीर-क्षीर विवेक रखता है। जिस प्रकार हंस दूध और पानी के मिश्रण में से दूध ग्रहण करने का प्रतीक माना जाता है, उसी प्रकार परमहंस संसार में रहते हुए भी उसके दोषों को त्यागकर ईश्वर के गुणों को आत्मसात करता है। वह संसार में रहकर भी मोह-माया और सांसारिक विकारों से निर्लिप्त रहता है।
उन्होंने शुकदेव जी, सनकादिक ऋषियों, राजा जनक और जड़भरत जी को परमहंस के श्रेष्ठ उदाहरण बताते हुए कहा कि परमहंस की चार अवस्थाएं मानी गई हैं—कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। इनमें परमहंस अवस्था सर्वोच्च है, जहां साधक मान-सम्मान की इच्छा और अपमान के भय से मुक्त हो जाता है।
महाराज जी ने कहा कि कलियुग में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करता है और उसे परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।
31 अक्टूबर तक चलेगी कथा, 1 नवंबर को विशाल भंडारा
महासभा के मीडिया प्रभारी अशोक असवाल ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा 31 अक्टूबर तक प्रतिदिन शाम 4 बजे से 7 बजे तक आयोजित की जाएगी। कथा के समापन के बाद 1 नवंबर को विशाल भंडारे का आयोजन होगा, जिसमें श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करेंगे।
कथा के तृतीय दिवस के मुख्य यजमान के.एन. पाठक, भवान सिंह रावत, हरीश रौतेला, आर.पी. जुयाल एवं पुष्पा देवी रहे।
इस अवसर पर बहादुर सिंह बिष्ट, चन्द्र शेखर पाण्डे, अधिराज कठैत, बलवीर सिंह पुण्डीर, सते सिंह भंडारी, प्रेम सिंह बिष्ट, अमरनाथ राय, शरद निगम, डी.डी. नरियाल, हरेन्द्र नेगी, महेन्द्र सिंह राणा, संगीता रावत, मधु निगम, बीना नेगी, पुष्पा रावत, मालती रावत, बीना श्रीवास्तव, सीता सेलाकोटी, बिमला बिष्ट, नीलम जुयाल, लक्ष्मी भंडारी, प्रमीला रावत, प्रेमा बिष्ट, सुशीला रौतेला, उषा तिवारी सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।